लपटों में घिरा ईरान का पार्स… मानवता की वेदना और ‘प्रलय’ की एक तस्वीर! – iran war pars oil field gulf nations oil gas refinery attack Israel america retaliation ntcppl


मार्च 19, 2026. वाल्टर सोबचक सही था. ‘द बिग लेबोव्स्की’ मूवी का वो काल्पनिक, बंदूकधारी और बॉलिंग-लेन वाला दार्शनिक. उसका बस एक ही नियम था. आप ‘लाइन’ क्रॉस नहीं करेंगे. अगर आपने लाइन पार की, तो आप सीधे मुसीबतों के भंवर में फंस जाएंगे. तब भी किसी ने वॉल्टर की बात नहीं सुनी थी. और अब भी कोई वॉल्टर की बात नहीं सुनता. और नतीजा यह है कि आज हम इस मोड़ पर खड़े हैं. 

कल रात, इजरायल ने ईरान में दक्षिण पार्स पर हमला किया और उसे आग के हवाले कर दिया. यह पहली बार है जब इजरायल ने यहां नैचुरल गैस प्रोडक्शन करने वाले सेंटर पर हमला किया है. ट्रंप, जो कभी भी सुर्खियां बटोरने का मौका नहीं छोड़ते ने ट्रुथ सोशल पर ऐलान किया कि ईरान ‘आतंकवाद का नंबर वन सरकारी स्पॉन्सर है’ है और अमेरिका ‘तेजी के साथ उसे तबाह कर रहा है.’

ईरान तबाह किया जा रहा है. क्या खूब कहा. 

साउथ पार्स दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है. ईरान इसे कतर के साथ साझा करता है. और अब, यह दोनों के लिए ही आग की लपटों में घिरा है. 2025 में यहां गैस का रोजाना उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचकर 730 मिलियन क्यूबिक मीटर हो गया था. अब इस बात को ‘भूतकाल’ में कहना ही ज़्यादा अच्छा लगता है.

ईरान ने जवाबी कार्रवाई की. तेजी से, सटीक तरीके से और लिस्ट बनाकर. ईरानी अधिकारियों ने कहा कि सऊदी अरब, UAE और कतर में पांच ठिकानों को “आने वाले कुछ घंटों में निशाना बनाया जाएगा.” इस लिस्ट में थे- सऊदी अरब की SAMREF रिफाइनरी और जुबैल पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, UAE का अल होस्न गैसफील्ड और कतर की रास लफान रिफाइनरी और मेसाईद पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स. 

और ईरान अपने जुबान पर कायम रहा. 

कतर के ‘रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी’ पर ईरानी हमले के बाद “व्यापक क्षति” पहुंची. रास लफान दुनिया के सबसे बड़े लिक्विफाइड नेचुरल गैस एक्सपोर्ट प्लांट का केंद्र है. ईरान के हमले के बाद यह प्लांट धधक उठा. व्यापक और क्षति. ये दो शब्द, अगर अलग-अलग देखें, तो सुनने में महज सरकारी लगते हैं. लेकिन इस वाक्य में, जब ये दोनों साथ आते हैं, तो इसके मायने मौजूदा समय को बदलने की ताकत रखते हैं.

आइए बात करते हैं कि रास लफ़ान असल में है क्या? विदेश मंत्रालय से आने वाली कूटनीतिक भाषा में नहीं, बल्कि घर के बिलों और खाली प्लेटों की भाषा में.

रास लफान में LNG का उत्पादन करता है. यहां खाद भी बनता है जैसे- यूरिया, अमोनिया. ये खेती बारी के लिए बड़ा अहम है. यही नहीं इनके अलावा यहां पर सल्फर और हीलियम का भी उत्पादन होता है. हीलियम एक ऐसी गैस है जो माइक्रोचिप्स के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है.

इसे फिर से पढ़िए. धीरे-धीरे.

यूरिया. आधुनिक कृषि की नाइट्रोजन-आधारित रीढ़. हीलियम. सेमीकंडक्टर निर्माण, MRI मशीनों और क्वांटम कंप्यूटिंग के उन सपनों का अदृश्य इंजन जिनसे उम्मीद की जाती है कि ये हमें खुद से बचाएंगे. लेकिन सब खत्म. या फिर बुरी तरह से बर्बाद. 

कतर दुनिया भर में LNG की कुल जरूरत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा एक्सपोर्ट करता है. इस मामले में अमेरिका के बाद कतर का नंबर दूसरा है.और इसकी लगभग सारी गैस ‘रास लफ़ान’ से ही एक्सपोर्ट की जाती है. एशिया इसी गैस से चलता है. हमारे सबसे करीबियों के ही उदाहरण लीजिए. पाकिस्तान और बांग्लादेश. ये दोनों ही देश अपनी जरूरत की लगभग 99 प्रतिशत और 70 प्रतिशत LNG कतर से ही इंपोर्ट करते हैं. 99 प्रतिशत! पाकिस्तान सिर्फ कतर से LNG खरीद ही नहीं रहा है; बल्कि पाकिस्तान तो खुद ही कतर की LNG पर टिका हुआ है. या यूं कहें कि टिका हुआ था. 

भारत अपनी 40 प्रतिशत से ज़्यादा LNG सिर्फ इसी एक प्लांट से लेता है. अब जरा सोचिए, अगर यह 40 प्रतिशत हिस्सा अचानक से गायब हो जाए, तो क्या होगा? बेड़ागर्क!

भारत के पास LNG के घरेलू भंडार बहुत सीमित हैं. गुजरात के तट पर कुछ टैंकर आकर रुके हैं. लेकिन वे भी बस कुछ ही हैं.

पाकिस्तान और बांग्लादेश के पास भी LNG के घरेलू भंडार बहुत सीमित हैं.

अनुमान के मुताबिक उनका यह रिजर्व लगभग एक या दो हफ़्ते तक ही चल पाएगा. 

महीनों तक नहीं. क्वार्टर भी नहीं. न ही यह कि “हम अगले वित्त वर्ष में अपने एनर्जी पोर्टफोलियो को रिस्ट्रक्चर कर लेंगे.” सिर्फ कुछ हफ्ते. कुछ दिनों तक तो काम चलता रहेगा. लेकिन फिर क्या? फिर, इंसानी इतिहास की सबसे पुरानी कहानी फिर से शुरू हो जाएगी: अंधेरा, हताशा, अराजकता. दोनों तरफ दो परेशान पड़ोसी. अगर वहां उथल-पुथल मची, तो भारत भी उसकी आंच महसूस करेगा. और तब तक हम भी अपने सीमित रिजर्व को और इस्तेमाल के लिए और सीमित कर चुके होंगे. डीजल और पेट्रोल को कोटा से बेचना पड़ेगा. कीमतें तेजी से बढ़ेंगी.

एशियाई बाजार खुलने के शुरुआती घंटों में WTI क्रूड बढ़कर $98.60 प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड $107.38 पर पहुंच गया. भारत के लिए इसकी कीमत पहले ही लगभग $150 तक पहुंच चुकी है. यूरोप का गैस बेंचमार्क 6 प्रतिशत उछल गया. बाजार तो परसेंटेज में बातें करते हैं, लेकिन परिवार भूख की भाषा में बात करेंगे. 

ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है. जिससे दुनिया का लगभग 20 फीसदी हिस्सा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस गुजरता है. इसके चलते ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं. 

समझिए. ग्लोबल एनर्जी का 20 फीसदी हिस्सा. गायब. यह कहानियों-कविताओं का कोई रूपक नहीं है. बल्कि सचमुच ये सप्लाई बंद होने वाली है.

अब जरा सोचिए कि इसका उन लोगों पर क्या असर पड़ेगा, जो आज घटनाओं की सूची में पहले पन्ने पर नहीं हैं. 

2024 में अकेले सऊदी अरब और UAE से वहां काम करने वाले परदेशियों ने 77 अरब डॉलर रकम बाहर भेजी. पूरे खाड़ी क्षेत्र से तो यह आंकड़ा 131 अरब डॉलर था. ये महज़ आंकड़े नहीं हैं. ये बच्चों की स्कूल की फीस हैं. मेडिकल बिल हैं. किराया है. यह वह मासिक वायर ट्रांसफ़र है जो मुल्तान या मलप्पुरम या मयमनसिंह में रहने वाले किसी परिवार की गाड़ी को चलायमान रखता है.

2024 में अकेले भारत में 137 बिलियन डॉलर रेमिटेंस मिली. इस मोटे पैसे से दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस पाने वाले देश के तौर पर उसकी जगह बनी रही. इसका एक बड़ा हिस्सा उस इलाके से आता है, जो इस समय आग की चपेट में है.

जब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था टूटती है, तो इसके साथ ये सुहाने आंकड़े भी टूट जाते हैं. जब मजदूर घर लौटते हैं, बेरोजगार और टूटकर, ऐसे देशों में जिनकी अर्थव्यवस्था पहले से ही ईंधन की महंगाई से जूझ रही होती है, ऐसी स्थिति में पैसा तो आना तो बंद हो जाता है लेकिन रोटी खाने वाला मुंह कहां बंद होता है.  

सरकारों से इस बारे में जनता जवाब मांगेगी. सरकारों के पास कोई अच्छा जवाब नहीं होगा. जो सरकारें भूखे लोगों को अपने जवाब से संतुष्ट नहीं कर पाती हैं ऐसी सरकारों को अक्सर बदल दिया जाता है. कुछ को शांति से. कुछ को अशांति से. 

और फिर खास तौर पर जब भारत की बात होती है. 

वह भारत नहीं जो भू-राजनीतिक खिलाड़ी है. वह भारत नहीं जो कूटनीतिक दावों वाला उभरता हुआ सुपरपावर है. बल्कि वह भारत जहां फैक्ट्री के लिए मजदूर तैयार होते हैं, वह भारत जहां किसान खेत में काम करते हैं, वह भारत जो बीमारियों से जूझ रहा है.

भारत की तेल सप्लाई की जरूरतों का सिर्फ़ 10 प्रतिशत हिस्सा ही घरेलू उत्पादन से पूरा होता है. सिर्फ़ दस प्रतिशत. बाकी 90 प्रतिशत तेल बंदरगाहों के रास्ते आता है. ज़्यादातर खाड़ी देशों के बंदरगाहों से. फिलहाल ये बंदरगाह टकराव से चोटिल हैं. भारत अभी भी रूसी कच्चे तेल पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में रूसी तेल का हिस्सा लगभग 34 प्रतिशत है. 

रूस भारत के लिए एक स्मार्ट विकल्प था. डिस्काउंट से मार्जिन बनी रही और रिफाइनरी को मुनाफा भी होता रहा. चीजें स्मूथ चलीं. लेकिन रूसी तेल भी कई रास्तों से हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है. और वो स्ट्रेट अभी बंद है. जब ये खुलेगा, तब भी खाड़ी देश ज्यादा कुछ नहीं दे पाएंगे. उत्पादन पहले जैसा होने में कई साल से लेकर एक दशक तक लग सकता है. 

वित्त वर्ष 25 में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत 239.2 मिलियन मीट्रिक टन रही. यह महज एक आंकड़ा नहीं है. इसका मतलब है- ट्रक, बसें, ट्रैक्टर, जनरेटर, दफ़्तर, अस्पताल और आपकी अपनी कारें लगातार चलती रहें. इनमें से हर एक को चलाना अचानक से ज़्यादा महंगा हो गया है, या फिर वे बिल्कुल भी काम नहीं कर रहे हैं.

ज़रा सोचिए कि भारत में पेट्रोकेमिकल्स का असल में किन-किन चीज़ों से सीधा कनेक्शन है. हर चीज से. क्या गिनाएं सचमुच हर चीज से. हैरान कर देने वाली हद तक, हर एक चीज़ से. 

पेट्रोकेमिकल्स से बने सिंथेटिक फाइबर जैसे पॉलिएस्टर, नायलॉन और एक्रिलिक टेक्सटाइल्स सेक्टर के अभिन्न अंग हैं, खासकर कृत्रिम फाइबर उत्पादन में. ये सेक्टर भारत के तेजी से बढ़ते और निर्यात-उन्मुख वस्त्र उद्योग को सहारा देता है. कपड़ा उद्योग. लाखों रोजगार. गुजरात, तमिलनाडु, तेलंगाना में. कच्चे माल की कीमतें बढ़ती हैं, मुनाफा घटता है, ऑर्डर कम होते हैं, शिफ्टों में कटौती होती है. तिरुपुर की उस महिला के लिए कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती जिसकी ओवरटाइम की कमाई चली जाती है. 

यूरिया और अमोनिया जैसे खाद, प्लास्टिक, सिंचाई के पाइप और फसलों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायन. ये सभी पेट्रोकेमिकल फ़ीडस्टॉक पर निर्भर करते हैं, इससे भारतीय कृषि की उत्पादकता बढ़ती है. अब ये ऐसी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं जो जलते हुए गैस क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं. 

रबी की फसल तो पहले ही बोई जा चुकी है, लेकिन खरीफ की फसल अभी नहीं बोई गई है. और अब से लेकर खरीफ के मौसम के बीच हर इनपुट की कीमत सिर्फ एक ही दिशा में जाएगी. ऊपर की ओर. जो किसान पहले से ही मुश्किल में हैं, वे और भी ज़्यादा दबाव में आ जाएंगे. भारत अच्छी तरह जानता है कि जब किसानों को हद से ज़्यादा परेशान किया जाता है, तो क्या होता है. देश ने दो साल तक दिल्ली के बाहर के हाईवे पर यही सब होते हुए देखा है. 

उर्वरक और एग्रोकेमिकल उद्योग खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, और इस प्रकार ये सेक्टर भारत की विकासशील और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जो भारत के विशाल अकुशल मजदूर वर्ग को सबसे अधिक नौकरियां देती  हैं.

फार्मास्यूटिकल्स. भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है. यहां से जेनेरिक दवाएं दुनिया भर में निर्यात की जाती हैं. उन देशों को भी, जो बाकी सभी देशों पर प्रतिबंध लगाते हैं. इंजीनियरिंग प्लास्टिक, सिंथेटिक रबर और स्पेशलिटी पॉलीमर का उपयोग ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिकल उपकरणों और कंज्युमर इलेक्ट्रॉनिक्स में बड़े पैमाने पर किया जाता है.

ऑटो सेक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर, कंस्ट्रक्शन सेक्टर. जो PVC पाइप, पेंट, एडहेसिव और कोटिंग्स पर निर्भर करता है; ये सभी उसी क्रूड ऑयल से बने उत्पाद हैं, जो अब या तो महंगा हो गया है, या दुर्लभ, अथवा दोनों ही. 

भारत में केमिकल और पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री में 20 लाख से ज़्यादा लोग काम करते हैं और यह 80,000 से ज़्यादा तरह के केमिकल और पेट्रोकेमिकल बनाती है. एक ऐसे देश में, जहां एक फैक्टरी की नौकरी चार से पांच लोगों का पेट पालती है, वहां इसका अप्रत्यक्ष असर इस आंकड़े को एक बेहद चिंताजनक स्तर तक पहुंचा देता है.

और फिर आती है विकास की कहानी. वही कहानी जो भारत खुद को और पूरी दुनिया को सुनाता रहा है. ‘भारत मंडपम’ में होने वाले बड़े-बड़े आयोजनों के साथ. 

भारत से उम्मीद थी कि दुनिया भर में तेल की मांग में होने वाली बढ़ोतरी वह सबसे आगे रहेगा. 2026 में इसकी खपत 5.99 मिलियन बैरल प्रति दिन रहने का अनुमान था. यह अनुमान पिछली रात से पहले लगाया गया था. आग लगने से पहले. स्ट्रेट के बंद होने से पहले. कच्चे तेल की कीमत सौ डॉलर के पार जाने और लगातार बढ़ने से पहले. भारत की GDP वृद्धि जिसका वित्त वर्ष 2025-26 में 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान था, उन इनपुट पर आधारित थी जिनकी कीमतें अब बदल चुकी हैं.  

विकास की इस कहानी में हर एक फीसदी ग्रोथ एनर्जी की कीमतों को अनुमान में लेकर तय की गई थी. वह अनुमान अभी-अभी बदल गया है.  बस ऐसे ही.

विनिर्माण के सपने, ‘मेक इन इंडिया’ की महत्वाकांक्षाएं, और पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र को 2040 तक एक ट्रिलियन डॉलर का बाज़ार बनाने की जो कल्पनाएं भारत ने संजोई थीं. जिसके तहत इस उद्योग का आकार 2024 के 220 अरब डॉलर से बढ़कर 2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर हो जाने का अनुमान था, अब ये पूरी कल्पना, पूरी ड्राइंग रियल टाइम में मिटती दिख रही है. वजह से फारस की खाड़ी में लगी आग. 

यह सब कुछ एक ही दिन में नहीं होता. दर्द बढ़ता जाता है. धीरे-धीरे. फिर तेजी से. वो कहते हैं न… मेंढक को पानी अब थोड़ा थोड़ा गर्म लग रहा है, लेकिन अभी भी बैचेनी नहीं है. वो आराम से बैठा है. लेकिन जब पानी खोलने लगेगा, वो समय दूर नहीं है. 

किफायती कच्चे तेल की आपूर्ति न होने पर रिफाइनरी कम क्षमता पर चलने लगती है. कच्चा माल न मिलने पर खाद बनाने वाला कारखाना उत्पादन कम कर देता है. यूरिया का खर्च न उठा पाने पर किसान कम फसल उगाता है. कम पैदावार होने से कीमतें बढ़ जाती हैं. भोजन पर अधिक खर्च करने वाला परिवार बाकी चीजों पर कम खर्च करता है.  उपभोग पर आधारित अर्थव्यवस्था में मंदी आने पर कारखाने बंद होने लगते हैं. कारखानों के बंद होने से श्रमिकों की छंटनी होती है. जिन श्रमिकों की छंटनी हो जाती है और साथ ही वह खाड़ी देशों से आने वाले रियाल-दिनार को भी बंद होते देखता है तो यह कोई आर्थिक चुनौती नहीं है. यह एक सामाजिक आपातकाल है. भारत पहले भी ऐसी स्थिति से गुजर चुका है. ठीक-ठीक एकदम ऐसी स्थिति में तो नहीं, लेकिन कुछ कुछ याद जरूर है. 

डोमिनो इफ़ेक्ट कोई थ्योरी नहीं है. यह एक ऐसा बुरा सपना है जो अभी घट रहा है.

खाड़ी देशों और पूरी दुनिया के बड़े एनर्जी कॉम्प्लेक्स में प्रोडक्शन रुक गया है. एनर्जी की ज्यादा कीमतें पहले से ही घाटे को और बढ़ा रही हैं, जिससे करेंसी पर दबाव पड़ रहा है. रुपया तो पहले ही डॉलर के साथ 95 पर रोमांस कर रहा है.

करेंसी. महंगाई. खाना. दवाएं. खाद. चिप्स. हीलियम. MRI मशीनें. AI से जुड़ी उम्मीदें.

यह सिलसिला इतना लंबा है कि किसी नौजवान का ध्यान भी इतनी देर तक नहीं टिक पाता. 

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने “बेकाबू नतीजों” की चेतावनी दी, जो “पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकते हैं.” इस बार सचमुच में मध्य-पूर्व का कोई नेता कैमरों के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बातें नहीं कर रहा है. वह एक रोडमैप पेश कर रहा है. 

माना जाता है कि साउथ पार्स-नॉर्थ डोम के मिले-जुले भंडार में लगभग 1,800 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस मौजूद है, इसे 13 साल से ज़्यादा समय तक दुनिया की ऊर्जा की मांग को पूरा करने के लिए काफी माना जाता है. यह गैस मौजूद है. और यह मौजूद रहेगी. 

जलते हुए प्लेटफार्मों के नीचे, समुद्र की तलहटी के जख्मों के नीचे, और ताकतवर लोगों के भू-राजनीतिक घमंड के नीचे, इतनी ऊर्जा मौजूद है जो धरती के हर घर को एक पूरी पीढ़ी तक गर्म रखने के लिए काफी है.

ऐसा हो सकता है कि अब यह उपलब्ध न रहे. शायद लंबे समय के लिए.

वाल्टर सोबचक के पास इस बारे में कहने के लिए कुछ न कुछ जरूर होता. लेकिन वॉल्टर तो बस एक काल्पनिक, प्यारा-सा पागल था, जिसके पास एक पिस्तौल होती थी. 

जो लोग ये फैसले ले रहे हैं, उनके पास तो वायु सेनाएं हैं.

हमारे पास बस कुछ महीनों का रिज़र्व बचा है, और साथ ही यह धीरे-धीरे बढ़ता हुआ एहसास भी कि जो लोग सत्ता में हैं उनमें से किसी ने भी असल में अपने ही युद्ध के ‘परिणाम’ वाले हिस्से को पढ़ा ही नहीं है. 

हमने हद पार कर दी है. स्वागत है. जय हो!

—- समाप्त —-



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